राजनीति का वो चेहरा जिसने देश को आर्थिक मजबूती दी
राजनीति शब्द अपने आप में ही स्पष्ट है, एक राज्य की नीति क्या होनी चाहिए. राजनीति में सबसे अहम किरदार एक राजनेता निभाता है. वैसे तो राजनीति की मलाई सभी खाना चाहते हैं, लेकिन जनता जनार्दन तय करती है कि राजनीति में किसको ताज मिलेगा और किसको मिलेगी करारी शिकस्त. कुछ राजनेता ऐसे भी हैं, जिनके योगदान को झुठलाया नहीं जा सकता है.
आज बात करते हैं पामुलापति वेंकट नरसिंह राव की. प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए उन्होंने नई आर्थिक नीति की शुरुआत की, जिसमें देश की अर्थव्यवस्था को वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ने का प्रयास किया गया. इसमें वह काफी हद तक सफल भी रहे.
जीवन परिचय

स्वतंत्र भारत के नौवें प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव का जन्म 28 जून, 1921 को आंध्र प्रदेश के एक छोटे से गांव करीम नगर में हुआ था. बहुत ही कम लोग उनके पूरे नाम पामुलापति वेंकट नरसिंह राव से परिचित हैं. इनके पिता का नाम पी.रंगा था. नरसिंह राव ने उस्मानिया विश्विद्यालय तथा नागपुर और मुंबई के विश्विद्यालयों से विधि संकाय में स्नातक और स्नातकोत्तर की उपाधियां प्राप्त की. पी.वी नरसिंह राव राजनीति के अतिरिक्त कला, साहित्य, संगीत आदि विभिन्न विषयों में भी रूचि रखते थे. नरसिंह राव की विभिन्न भारतीय भाषाओं पर भी अच्छी पकड़ थी. अलग-अलग भाषाओं को सीखना और उन्हें बोलचाल में प्रयोग करना उनका अनूठा शौक था. पी.वी. नरसिंह राव को भारत के पहले दक्षिण भारतीय प्रधानमंत्री बनने का भी गौरव प्राप्त है.
पी.वी. नरसिंह राव का व्यक्तित्व
पी.वी नरसिंह राव विभिन्न प्रतिभाओं के धनी थे. राजनीति के ज्ञाता होने के साथ ही उन्हें सिनेमा और थियेटर में भी समान रुचि थी. वह भारतीय दर्शन और संस्कृति में भी विशेष दिलचस्पी रखते थे. वह शांत व्यक्तित्व वाले प्रधानमंत्री थे. वह बोलने से ज्यादा करने में विश्वास रखते थे. उन्हें भाषाओं को सीखने का जुनून था. न सिर्फ भारतीय भाषाएं, बल्कि वह स्पेनिश और फ्रांसीसी भाषाएं भी बोल और लिख सकते थे.
पी.वी. नरसिंह राव का राजनैतिक सफर
नरसिंह राव ने स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाई और आजादी के बाद वह पूर्ण रूप से राजनीति में आ गए. लेकिन वह काफी समय तक आंध्र-प्रदेश की राजनीति में ही संलिप्त रहे. उन्हें अपने काम के लिए बहुत ख्याति मिली. 1962 से 1971 के बीच वह आंध्र-प्रदेश के एक विख्यात और मजबूत राजनेता बन गए. वह 1971 से 1973 तक प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे. नरसिंह राव कॉग्रेस के प्रति पूर्ण समर्पित नेता थे. उन्होंने आपातकाल के समय भी इन्दिरा गांधी को सहयोग दिया. कॉंग्रेस के विघटन के बाद भी वह इन्दिरा गांधी के ही साथ रहे, क्योंकि वह इन्दिरा की लोकप्रियता और उनकी राजनैतिक मजबूती को बहुत अच्छी तरह समझते थे. राजीव गांधी की हत्या के पश्चात योग्य प्रधानमंत्री की जरूरत महसूस हुई. उस समय नरसिंह राव का नाम सामने आया. यद्यपि उस समय स्वास्थ्य की दृष्टि से परिस्थितियां अनुकूल नहीं थी, लेकिन कई दिग्गज नेताओं के दबाव में उन्होंने प्रधानमंत्री का पद संभालना स्वीकार कर लिया. प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने के बाद उनके लगातार गिरते हुए स्वास्थ्य में भी सुधार होने लगा. कर्त्तव्य और उत्तरदायित्वों की भावना ने उन्हें और मजबूती प्रदान कर दी थी. प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए उन्होंने नई आर्थिक नीति की शुरुआत की, जिसमें देश की अर्थव्यवस्था को वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ने का प्रयास किया गया. इसमें वह काफी हद तक सफल भी रहे.
नरसिंह राव से जुड़ी विवादास्पद घटनाएं
पी.वी. नरसिंह राव के लिए प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचना भले ही आसान रहा हो, लेकिन अपने कार्यकाल में उन्हें अनेक आरोपों और विवादों का सामना करना पड़ा. इन्हें भ्रष्टाचार और हवाला जैसे आरोपों का सामना करना पड़ा. हर्षद मेहता ने उन पर यह आरोप लगाया कि अपने ऊपर लगे आरोपों से मुक्त होने के लिए उसने नरसिंह राव को 1 करोड़ रूपयों की रिश्वत दी थी. इसके अतिरिक्त उन पर बहुमत साबित करने के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त के भी आरोप लगे. अयोध्या की बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद पर उन पर असफल और मूक प्रधानमंत्री जैसे कई आरोप लगाए गए. इन्दिरा गांधी की हत्या के पश्चात दिल्ली में जो दंगे भड़के, उसके लिए भी नरसिंह राव की इस मुद्दे के प्रति उदासीनता को ही दोषी माना गया. उस समय वह देश के गृहमंत्री थे.
अंतर्राष्ट्रीय मामलों में भूमिका
विदेश मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान श्री राव ने अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के क्षेत्र में अपनी शैक्षिक पृष्ठभूमि एवं राजनीतिक तथा प्रशासनिक अनुभव का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया. प्रभार सँभालने के कुछ ही दिनों बाद उन्होंने जनवरी 1980 में नई दिल्ली में संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन के तृतीय सम्मेलन की अध्यक्षता की. उन्होंने मार्च 1980 में न्यूयॉर्क में जी-77 की बैठक की भी अध्यक्षता की. फरवरी 1981 में गुट निरपेक्ष देशों के विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में उनकी भूमिका के लिए श्री राव की बहुत प्रशंसा की गई थी. श्री राव ने अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक मुद्दों में व्यक्तिगत रूप से गहरी रुचि दिखाई व्यक्तिगत रूप से मई 1981 में कराकास में ईसीडीसी पर जी-77 के सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया. वर्ष 1982 और 1983 भारत और इसकी विदेश नीति के लिए अति महत्त्वपूर्ण था. खाड़ी युद्ध के दौरान गुट निरपेक्ष आंदोलन का सातवाँ सम्मलेन भारत में हुआ जिसकी अध्यक्षता श्रीमती इंदिरा गांधी ने की. वर्ष 1982 में जब भारत को इसकी मेजबानी करने के लिए कहा गया और उसके अगले वर्ष जब विभिन्न देशों के राज्य और शासनाध्यक्षों के बीच आंदोलन से सम्बंधित अनौपचारिक विचार के लिए न्यूयॉर्क में बैठक की गई, तब श्री पी.वी. नरसिंह राव ने गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों के विदेश मंत्रियों के साथ नई दिल्ली और संयुक्त राष्ट्र संघ में होने वाली बैठकों की अध्यक्षता की थी.श्री राव विशेष गुट निरपेक्ष मिशन के भी नेता रहे जिसने फिलीस्तीनी मुक्ति आन्दोलन को सुलझाने के लिए नवंबर 1983 में पश्चिम एशियाई देशों का दौरा किया. श्री राव नई दिल्ली सरकार के राष्ट्रमंडल प्रमुखों एवं सायप्रस सम्बन्धी मामले पर हुई बैठक द्वारा गठित कार्य दल के साथ सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे.विदेश मंत्री के रूप में श्री नरसिंह राव ने अमेरिका, यू.एस.एस.आर, पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान, वियतनाम, तंज़ानिया एवं गुयाना जैसे देशों के साथ हुए विभिन्न संयुक्त आयोगों की भारत की ओर से अध्यक्षता की.
नरसिंह राव का निधन
2004 के आस-पास नरसिंह राव की तबियत खराब रहने लगी थी. सांस लेने में तकलीफ के कारण उन्हें 9 दिसंबर, 2004 को एम्स में दाखिल कराया गया. कुछ दिन अस्पताल में डॉक्टरों की निगरानी में रहने के बाद 23 दिसंबर को उन्होंने अपना देह त्याग दिया.
नरसिंह राव के जीवन में आंध्र प्रदेश की राजनीति से प्रधानमंत्री के पद तक का सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा. राजनीति से सन्यास लेने के बाद वह पूरी तरह से साहित्य में संलिप्त हो गए. भाषाओं का अच्छा ज्ञान होने के कारण उन्होंने विभिन्न भाषाओं के साहित्यों का हिन्दी में और हिंदी भाषा के साहित्यों का अनुवाद अन्य भाषाओं में किया. अपने जीवन के अंतिम चरणों में उन्होंने राजनैतिक उपन्यास द इनसाइडर लिखा. इसके अलावा राम मंदिर और बाबरी मस्जिद से संबंधित एक पुस्तक भी लिखी, जिसमें उन्होंने तथ्यों और विश्लेषण के आधार पर अपनी भूमिका को स्पष्ट किया. उनका राजनैतिक जीवन काफी विवादास्पद रहा, लेकिन अपने आर्थिक सुधारों और विभिन्न भाषाओं के ज्ञाता के रूप में वह हमेशा जाने जाते रहेंगे.

