अमरकंटक में आस्था भी ‘टैक्स’ के घेरे में! ₹100 की रसीद से शुरू होता है शुल्क का सिलसिला
पार्किंग से व्यू-प्वाइंट तक जगह-जगह शुल्क, श्रद्धालुओं का सवाल—रसीद के साथ सुविधाएं कब?
शुल्क लेने पर नहीं, सुविधाओं पर सवाल: जाम, पार्किंग और अव्यवस्था से पर्यटक परेशान

अमरकंटक (GPM)
मां नर्मदा की उद्गम भूमि अमरकंटक देशभर के श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आस्था, अध्यात्म और प्राकृतिक सौंदर्य का प्रमुख केंद्र है। हर साल बड़ी संख्या में लोग यहां नर्मदा उद्गम, मंदिरों, सोनमुड़ा, कपिलधारा सहित विभिन्न धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों का भ्रमण करने पहुंचते हैं। लेकिन अब यहां आने वाले कुछ श्रद्धालु और पर्यटक जगह-जगह लिए जा रहे शुल्क, पार्किंग व्यवस्था, सुविधाओं की कमी और शुल्क वसूली के दौरान कथित बदसलूकी को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
पर्यटकों का कहना है कि अमरकंटक पहुंचने के बाद कई स्थानों पर अलग-अलग मदों में शुल्क और पार्किंग के नाम पर राशि ली जाती है। एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के लिए कई बार स्थानीय ऑटो, जीप या अन्य वाहनों का सहारा लेना पड़ता है। ऐसे में परिवार के साथ आने वाले श्रद्धालुओं का खर्च लगातार बढ़ता जाता है। पर्यटकों के मुताबिक, ₹100 की रसीद से शुरू होने वाला शुल्क का सिलसिला पार्किंग, अलग-अलग व्यू-प्वाइंट और अन्य दर्शनीय स्थलों तक पहुंचते-पहुंचते एक परिवार के लिए दिनभर में सैकड़ों रुपये तक पहुंच सकता है।

पर्यटकों की शिकायत केवल शुल्क लिए जाने को लेकर नहीं है, बल्कि शुल्क वसूलने के तरीके और व्यवहार को लेकर भी है। उनका आरोप है कि कई बार उन्हें पहले रसीद काटकर थमा दी जाती है और जब वे पूछते हैं कि यह शुल्क किस मद में लिया जा रहा है या किस व्यवस्था के लिए है, तो स्पष्ट जानकारी देने के बजाय बहस की स्थिति बन जाती है। कुछ पर्यटकों ने शुल्क वसूली में लगे वॉलेंटियर के कथित तौर पर नशे की हालत में होने और श्रद्धालुओं से बदसलूकी करने के आरोप भी लगाए हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं तो प्रशासन को इसकी निष्पक्ष जांच कर आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए।
एक पर्यटक का कहना है कि “हमें कहीं भी जाना हो, पहले रसीद काट दी जाती है। पूछो कि किस बात की रसीद है और पैसा किसलिए लिया जा रहा है तो बहस शुरू हो जाती है। शुल्क लेना है तो नियम, दर और शुल्क का उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए।”

श्रद्धालुओं का कहना है कि शुल्क लिया जाना अपने आप में गलत नहीं है। यदि पार्किंग, प्रवेश या पर्यटन सुविधाओं के लिए निर्धारित शुल्क लिया जा रहा है और उसकी स्पष्ट रसीद दी जा रही है, तो पर्यटक उसका विरोध नहीं करेंगे। लेकिन सवाल यह है कि शुल्क के बदले सुविधाएं कितनी मिल रही हैं? रविवार, छुट्टियों और विशेष पर्वों के दौरान अमरकंटक में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। ऐसे समय में पार्किंग की समस्या, सड़कों पर वाहनों का दबाव, जाम, स्वच्छता और प्रमुख पर्यटन स्थलों पर भीड़ व्यवस्था की चुनौती को बढ़ा देती है।

पर्यटकों का सवाल है कि जब अलग-अलग स्थानों पर शुल्क लिया जा रहा है तो उसके बदले पार्किंग, सफाई, यातायात प्रबंधन और सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं पर्याप्त क्यों नहीं दिखाई देतीं? यदि किसी परिवार से कई स्थानों पर शुल्क लिया जा रहा है तो उसे कम से कम व्यवस्थित पार्किंग, साफ-सफाई, सुरक्षित आवागमन और बेहतर यातायात व्यवस्था का अनुभव मिलना चाहिए।
पर्यटकों के मुताबिक सोनमुड़ा और कपिलधारा जैसे प्रमुख पर्यटन स्थलों के एंट्री प्वाइंट तक शुल्क लिए जाने की शिकायतें हैं। अमरकंटक पहुंचने के बाद श्रद्धालुओं को चार-पांच किलोमीटर के दायरे में अलग-अलग वाहनों या स्थानीय साधनों से आवागमन करना पड़ता है। पहले जहां कई स्थानों पर इस तरह के शुल्क नहीं लगते थे, वहीं अब जगह-जगह राशि लिए जाने से लोगों में नाराजगी बढ़ रही है। श्रद्धालुओं का कहना है कि शुल्क बढ़ने के साथ यदि सुविधाएं भी उसी अनुपात में बढ़तीं तो शायद सवाल नहीं उठते।

पर्यटको का कहना है कि शुल्क लिया जाना गलत नहीं है, लेकिन उसके बदले पार्किंग, सफाई, सुरक्षा और यातायात जैसी मूलभूत सुविधाएं भी नजर आनी चाहिए। यदि पर्यटक हर स्थान पर शुल्क दे रहा है तो उसे व्यवस्थित और सुविधाजनक पर्यटन का अनुभव भी मिलना चाहिए।
वहीं पर्यटक सुनील का कहना है कि अमरकंटक आने वाले श्रद्धालु यहां आस्था के साथ प्रकृति का आनंद लेने आते हैं। जगह-जगह शुल्क के साथ यदि सुविधाएं भी बेहतर हों तो पर्यटकों का अनुभव और अच्छा हो सकता है। शुल्क व्यवस्था पारदर्शी हो और पर्यटकों को यह महसूस हो कि उनके द्वारा दिए गए शुल्क का उपयोग व्यवस्था सुधारने में हो रहा है।
अमरकंटक को तीर्थनगरी और प्रमुख पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। अमरकंटक विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष के रूप में राजेंद्र भारती को जिम्मेदारी दी गई है। नर्मदा महोत्सव सहित वर्षभर होने वाले विभिन्न धार्मिक, सांस्कृतिक और मेलों के कारण भी यहां दूर-दूर से श्रद्धालुओं और पर्यटकों का पहुंचना अच्छी बात है। इससे स्थानीय व्यापार और रोजगार को भी बढ़ावा मिलता है। लेकिन श्रद्धालुओं का कहना है कि पर्यटन बढ़ने के साथ व्यवस्थाओं का विस्तार भी होना चाहिए।
लोगों का सवाल है कि जब विभिन्न माध्यमों से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से शुल्क एवं राजस्व प्राप्त होता है, तो उसके बाद पर्यटन स्थलों पर अलग-अलग शुल्क लेने की आवश्यकता और उसकी उपयोगिता क्या है? यदि शुल्क लिया जा रहा है तो इसकी पूरी व्यवस्था पारदर्शी होनी चाहिए और यह भी सार्वजनिक होना चाहिए कि राशि किस संस्था या एजेंसी द्वारा ली जा रही है तथा उसका उपयोग किस सुविधा या विकास कार्य में किया जा रहा है।
कुछ श्रद्धालुओं का आरोप है कि धीरे-धीरे अमरकंटक के धार्मिक और प्राकृतिक स्वरूप पर व्यावसायिक गतिविधियों का दबाव बढ़ रहा है। उनका कहना है कि श्रद्धालु यहां मां नर्मदा के दर्शन, आस्था और प्राकृतिक वातावरण के लिए आते हैं। यदि हर पड़ाव पर शुल्क और अतिरिक्त खर्च सामने आएंगे तो तीर्थयात्रा का अनुभव प्रभावित होना स्वाभाविक है।

श्रद्धालुओं का यह भी कहना है कि “ना कोई शिकवा, ना कोई शिकायत सुनने वाला और कोई संबंधित अधिकारी मौके पर झांकने भी नहीं जाता, तो मनमानी की शिकायतें सामने आना स्वाभाविक है।” उनका कहना है कि प्रशासन को समय-समय पर शुल्क वसूली केंद्रों का निरीक्षण करना चाहिए। यह देखना चाहिए कि निर्धारित दरों का पालन हो रहा है या नहीं, पर्यटकों को वैध रसीद दी जा रही है या नहीं, कर्मचारियों का व्यवहार कैसा है और शुल्क के बदले निर्धारित सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं या नहीं।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल अमरकंटक की पर्यटन छवि को लेकर है। अमरकंटक केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि प्राकृतिक एवं पर्यटन महत्व का क्षेत्र भी है। यहां आने वाला पर्यटक यदि अच्छी व्यवस्था, स्वच्छ वातावरण, सम्मानजनक व्यवहार और सुरक्षित आवागमन का अनुभव लेकर लौटता है तो वह दोबारा आने के साथ दूसरों को भी यहां आने के लिए प्रेरित करेगा। इसके विपरीत यदि उसका अनुभव जगह-जगह शुल्क, जाम, पार्किंग की परेशानी, अव्यवस्था और कथित बदसलूकी से जुड़ता है तो इसका सीधा असर पर्यटन की छवि पर पड़ सकता है।
श्रद्धालुओं और पर्यटकों की मांग है कि प्रशासन अमरकंटक की पूरी शुल्क व्यवस्था की समीक्षा करे। किस स्थान पर कितना शुल्क लिया जाना है, शुल्क किस संस्था या एजेंसी द्वारा लिया जा रहा है, उसकी वैधता क्या है और उस राशि के बदले पर्यटकों को कौन-कौन सी सुविधाएं दी जा रही हैं—इन सभी जानकारियों को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया जाए। साथ ही शुल्क वसूली में लगे कर्मचारियों और वॉलेंटियर के व्यवहार की निगरानी की जाए तथा नशे की हालत में ड्यूटी करने या पर्यटकों से अभद्र व्यवहार करने की शिकायतों की जांच कर दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की जाए।

श्रद्धालुओं का सवाल सीधा है—रसीद के साथ सुविधा कब?
अमरकंटक में शुल्क व्यवस्था का उद्देश्य यदि पर्यटन सुविधाओं को बेहतर बनाना है तो पर्यटक उसका स्वागत करेंगे। लेकिन शुल्क केवल कमाई का जरिया बनकर रह जाए और उसके बदले मूलभूत सुविधाएं नजर न आएं तो सवाल उठना स्वाभाविक है। मां नर्मदा की उद्गम भूमि अमरकंटक की पहचान जगह-जगह कटने वाली रसीदों से नहीं, बल्कि स्वच्छता, सुविधा, सम्मानजनक व्यवहार, सुरक्षित वातावरण और बेहतर पर्यटन व्यवस्था से होनी चाहिए। शुल्क लीजिए, लेकिन सुविधा भी दीजिए—ताकि अमरकंटक आने वाले श्रद्धालु शिकायतें नहीं, बल्कि अच्छी यादें लेकर लौटें।

